वोह हमसफ़र
By Lokesh Bhardwaj / January 18, 2026 / No Comments / Poetries
ख्वाब आंखों में लेकर
चलता रहा हर राह पर
औऱ वो ख्वाब में आ, मेरी राह मंजिल कर गया।
सोचा करता था अक्सर
जिस हमसफर के बारे में
वो खुद आकर मुझसे, मुझको हासिल कर गया।
मैं इक छोटी सी कश्ती था,
इस दरिया-ए-जहां में,
और वो इन लहरो को ही मेरा साहिल कर गया।
मुकम्मल इश्क़ होता है,
देखा न था आज तक,
लब चूमते ही वो खुद को मेरे काबिल कर गया।
एक लफ्ज़ भी ना जाना था
जिस किताब-ए -वस्ल का
गले लगाकर मुझको वो, उसमे फ़ाज़िल कर गया।