देवू उस दिन भी वैसे ही साइकिल चला रहा था, जैसे हर दिन चलाता था। न ज़्यादा तेज़। न ज़्यादा धीरे। स्कूल की घंटी अभी कानों में गूंज रही थी। कंधे पर टंगा बैग हल्का नहीं था, पर देवू को आदत थी। बारह साल की उम्र में आदतें जल्दी बन जाती हैं।

सड़क वही थी। धूप वही थी। दोपहर का वह सुस्त-सा उजाला, जो चीज़ों को पीला कर देता है। देवू पैडल मार रहा था और सोच रहा था कि आज मैथ्स की कॉपी अधूरी रह गई है। सोच रहा था कि टीचर फिर डांटेंगे। सोच रहा था कि घर जाकर पानी पिएगा, फिर खेलेगा। यही सोचते हुए उसकी साइकिल के आगे कुछ गिरा। अचानक। इतना अचानक कि देवू ने ब्रेक ज़ोर से दबा दिए। साइकिल चरमराई। देवू लड़खड़ाया। और फिर रुक गया।

सड़क पर एक कबूतर पड़ा था। सीधा नहीं। उलटा नहीं। बस… गलत तरह से। उसका एक पंख फैला हुआ था, जैसे उड़ते-उड़ते किसी ने उसे बीच में रोक दिया हो। दूसरा पंख उसके नीचे दबा था। गर्दन थोड़ी टेढ़ी। आंखें खुली हुईं।

देवू पहले कुछ सेकंड बस खड़ा रहा। उसे समझ नहीं आया कि यह मरा हुआ है या ज़िंदा। बच्चों को फर्क करने में वक्त लगता है। क्योंकि मौत उनके लिए अभी पूरी तरह असली चीज़ नहीं होती। पास से एक स्कूटर गुज़रा। फिर एक साइकिल। किसी ने ध्यान नहीं दिया।

देवू ने साइकिल साइड में खड़ी की। धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसके जूते सड़क की धूल से सने थे। वह झुका। कबूतर की छाती हिल रही थी। बहुत हल्के से। जैसे सांस लेना भी उसे दर्द दे रहा हो।

देवू का दिल अजीब तरह से सिकुड़ गया। यह डर नहीं था। यह दया भी नहीं थी। यह कुछ बीच का था, जिसे बारह साल का बच्चा नाम नहीं दे सकता। उसने चारों तरफ देखा। कोई बड़ा नहीं था। कोई यह कहने वाला नहीं था कि “छोड़ दे।” या “हाथ मत लगा।”

देवू ने पहली बार उस कबूतर को छुआ। उसकी उंगलियां कांप रही थीं। पंख मुलायम नहीं था, जैसा किताबों में होता है। वह गर्म था। जिंदा चीज़ों की तरह गर्म। कबूतर ने हल्की-सी हरकत की। एक कमजोर-सी फड़फड़ाहट। जैसे कहना चाहता हो — मैं अभी यहां हूं।

देवू ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया। उसका दिल तेज़ धड़कने लगा। अब यह साफ था। यह ज़िंदा है। और अब यह सवाल भी साफ था, जिससे वह भाग नहीं सकता था।

अब क्या?

अगर वह चला जाए, तो थोड़ी देर में कोई गाड़ी आएगी। या कोई कुत्ता। या यह यूं ही पड़ा-पड़ा दम तोड़ देगा। देवू को यह सब नहीं पता था। पर उसका मन यह जानता था कि अगर वह यहां से चला गया, तो कुछ गलत हो जाएगा। बच्चों के फैसले दिमाग से नहीं, किसी अंदर की जगह से आते हैं। जहां तर्क नहीं होता। सिर्फ़ एक आवाज़ होती है।

देवू ने कबूतर को दोनों हाथों से उठाया। वह हल्का था। इतना हल्का कि देवू को डर लगा। जैसे यह हवा में ही टूट जाएगा। कबूतर का शरीर कांप रहा था। उसकी आंखें सीधी देवू की आंखों में थीं। उस पल कुछ हुआ। कोई चमत्कार नहीं। कोई संगीत नहीं। बस… एक खामोश जुड़ाव।

देवू ने पहली बार महसूस किया कि कोई पूरी तरह उस पर निर्भर है। वह कबूतर अब सड़क नहीं देख रहा था। गाड़ियां नहीं। आसमान नहीं। वह सिर्फ देवू को देख रहा था। देवू ने उसे अपनी शर्ट से ढक लिया। जैसे ठंड लग रही हो। हालांकि धूप तेज़ थी। लोग देखते हुए गुज़रे। किसी ने पूछा नहीं। किसी ने रोका नहीं।

देवू साइकिल चलाते हुए घर की तरफ बढ़ा। एक हाथ से हैंडल। दूसरे हाथ से कबूतर। सड़क लंबी लगने लगी। हर गड्ढा डरावना। हर झटका जैसे किसी और को लग रहा हो। घर पहुंचकर उसने दरवाज़ा धीरे खोला। मां रसोई में थीं। बर्तन खनक रहे थे।

“देवू, हाथ धो ले,” मां की आवाज़ आई।

देवू ने जवाब नहीं दिया। वह चुपचाप अपने कमरे में गया। दरवाज़ा बंद किया। कबूतर को फर्श पर रखा। वह फिर हिला। फिर शांत हो गया। देवू बैठ गया। घुटनों को छाती से लगा लिया। अब डर आया। अगर यह मर गया तो? अगर मां ने देख लिया तो? अगर उसे कुछ नहीं आता तो?

वह बार-बार कबूतर को देखता। जैसे आंखें हटाईं तो कुछ बुरा हो जाएगा।

उसे याद आया — पानी।

वह दौड़कर रसोई गया। एक छोटी कटोरी में पानी लिया। कमरे में लौटा। कबूतर ने पानी नहीं पिया। बस देखा। देवू को रोना आया। पर वह रोया नहीं। वह समझ गया था — यह काम आसान नहीं है। उसने अलमारी से एक पुराना रुमाल निकाला। कबूतर के नीचे रखा।

फिर उसने धीरे से कहा, बहुत धीरे, जैसे डर रहा हो कि आवाज़ से यह टूट जाएगा—

“तू ठीक हो जाएगा।” उसे नहीं पता था कि यह सच है या झूठ। पर उसने कहा। कुछ देर बाद मां ने दरवाज़ा खटखटाया। देवू ने खोल दिया। मां की नज़र कबूतर पर पड़ी।
एक पल के लिए।

“कहां से लाया?” आवाज़ सख्त नहीं थी। बस थकी हुई।

“सड़क से… गिरा हुआ था,” देवू ने कहा।

मां ने कुछ नहीं कहा। बस देखा।

फिर बोलीं, “ध्यान रखना। मर न जाए।”

यही था। कोई मना नहीं। कोई दुलार नहीं। मां चली गईं। दरवाज़ा बंद हुआ। कमरे में फिर वही खामोशी। देवू ने कबूतर को देखा। अब वह सिर्फ कबूतर नहीं था। देवू ने उसका नाम रखा। बिना सोचे। बिना कारण। नाम रखना आसान होता है। पर नाम के साथ जिम्मेदारी आ जाती है। देवू को यह नहीं पता था। बस इतना पता था कि अब यह “वह कबूतर” नहीं है।

अब यह उसका है। और यहीं, इसी छोटे से कमरे में, एक टूटी हुई उड़ान के साथ, देवू की पहली attachment जन्म ले चुकी थी। उसे नहीं पता था कि जो चीज़ उसने उठाई है, वह उसे बाद में कितना तोड़ेगी। उसे सिर्फ इतना पता था— वह इसे अकेला नहीं छोड़ सकता। और यही काफी था।

अगले दिन सुबह देवू नींद से नहीं, एक अजीब-सी बेचैनी से उठा। उसकी आंखें खुलते ही सीधे उस कोने की तरफ गईं जहाँ रात को उसने कबूतर को रखा था। कबूतर वहीं था। हिलता नहीं। भागता नहीं। बस… मौजूद। देवू ने लंबी सांस ली। जैसे किसी ने उसके सीने से पत्थर हटा दिया हो। वह चुपचाप उठा। नहाया नहीं। मुंह भी ठीक से नहीं धोया। सीधे रसोई गया।

मां चूल्हे के सामने थीं। “देवू, स्कूल के लिए देर हो रही है,” उन्होंने कहा।

देवू ने सिर हिलाया। पर उसके हाथ पहले ही दाने की कटोरी की तरफ बढ़ चुके थे। वह जानता भी नहीं था कि कबूतर क्या खाता है। बस इतना पता था कि खाली पेट कोई भी ठीक नहीं हो सकता। कमरे में आकर उसने दाना पास रखा। पानी रखा। कबूतर ने कुछ नहीं किया। देवू वहीं बैठ गया। ज़मीन पर। पीठ दीवार से टिका ली।

समय गुजरता रहा। धूप खिड़की से अंदर आने लगी। फिर, बहुत धीरे से, कबूतर ने चोंच आगे बढ़ाई। एक दाना। फिर दूसरा। देवू की आंखें भर आईं। इतनी सी बात। पर उसके लिए यह जीत थी।

वह स्कूल देर से पहुंचा। टीचर ने डांटा। क्लास ने हंसी दबाई। देवू ने कुछ नहीं सुना। उसका दिमाग कमरे में था।उस कोने में। जहाँ एक टूटी हुई उड़ान सांस ले रही थी।

दिन ऐसे ही बीतने लगे। एक दिन। फिर दूसरा। फिर तीसरा। देवू ने कबूतर के पंख को ध्यान से देखना शुरू किया। एक पंख ठीक था। दूसरा हर दिन थोड़ा-सा बेहतर। वह उसे छूता नहीं था। बस देखता था। जैसे देखने से ही दर्द कम हो जाएगा। वह स्कूल से आते ही सबसे पहले कमरे में जाता। बैग फेंक देता। जूते नहीं उतारता। कभी-कभी कबूतर हिलता। कभी नहीं। पर देवू हर दिन वहीं बैठता।

उसकी मां ने दो-तीन बार कहा, “इतना मत लग जा।” देवू ने सुना। पर समझा नहीं।

बारह साल का बच्चा attachment को चेतावनी नहीं मानता। वह उसे जिम्मेदारी समझता है।

बीस दिनों में देवू का जीवन बदल गया। वह खेलने नहीं जाता। वह टीवी नहीं देखता। वह दोस्तों के साथ ज्यादा नहीं हंसता। वह घर जल्दी लौटता। क्योंकि किसी को इंतजार था। कबूतर अब थोड़ा चलने लगा था। छोटे-छोटे कदम। डरते हुए। देवू हर बार सांस रोक लेता। जैसे गिर जाएगा। पर वह नहीं गिरता। एक दिन कबूतर ने अपने पंख फड़फड़ाए। बहुत हल्के से। देवू उछल पड़ा। फिर तुरंत रुक गया। खुशी और डर एक साथ आए। अगर यह उड़ गया तो? अगर गिर गया तो? उस रात देवू सो नहीं पाया।

वह बार-बार उठकर देखता रहा। जैसे कोई मां अपने बच्चे को देखती है। उसे यह ख्याल नहीं आया कि यह उसका बच्चा नहीं है। उसे सिर्फ यह लगा कि अगर यह गिरा, तो वह खुद गिर जाएगा।

बीसवां दिन सबसे शांत था। कबूतर लगभग ठीक था। पूरी तरह नहीं। पर इतना कि अब वह सिर्फ जमीन का नहीं रहा। देवू उसे बाहर नहीं ले गया। उसमें हिम्मत नहीं थी। पर उसने खिड़की खोली। हवा अंदर आई। धूप अंदर आई। कबूतर ने बाहर देखा। आसमान वहीं था। नीला। खुला हुआ। देवू का दिल अजीब-सा हुआ।

उसे पहली बार लगा कि यह चीज़ उसकी नहीं है। पर उसने यह बात जल्दी से मन से हटा दी। Attachment ऐसी ही होती है। वह सच को देर से पहचानती है। उस रात देवू ने कबूतर के पास बैठकर होमवर्क किया।

गलतियां कीं। पर खुश था। सोने से पहले उसने बहुत धीरे से कहा— “कल और अच्छा हो जाएगा।” कमरे में लाइट बंद हुई। पर देवू देर तक जागता रहा। क्योंकि आदत अब नींद से बड़ी हो चुकी थी।

उस दिन देवू स्कूल से थोड़ा जल्दी निकला था। कारण कोई खास नहीं था। बस मन नहीं लग रहा था। किताब बंद करते वक़्त उसे अजीब-सी घबराहट हुई थी, जैसे कुछ पीछे छूट रहा हो। साइकिल आज तेज़ चल रही थी। पैर अपने-आप पैडल दबा रहे थे। सड़क वही थी। धूप वही थी। पर देवू का दिल भारी था। घर के सामने साइकिल रोकी। गेट खोला। अंदर आया। सब कुछ सामान्य था। बहुत ज़्यादा सामान्य।

मां रसोई में थीं। टीवी की आवाज़ आ रही थी। पड़ोस में बच्चे खेल रहे थे। देवू ने किसी को आवाज़ नहीं दी। सीधे अपने कमरे की तरफ गया।

दरवाज़ा खुला। कमरा खामोश था। वह खामोशी वह वाली नहीं थी, जो बीस दिनों से उसकी आदत बन चुकी थी। यह कुछ और थी। देवू की नज़र सबसे पहले दाने की कटोरी पर गई। वह उलटी पड़ी थी। कुछ दाने फर्श पर बिखरे थे। पानी की कटोरी खाली थी। देवू ने एक कदम आगे बढ़ाया। उस कोने में, जहाँ वह हर दिन सबसे पहले देखता था, वहाँ कुछ पड़ा था। एक पंख। सिर्फ़ एक। सफेद। धूल से सना हुआ। जैसे किसी ने उसे बेरहमी से उखाड़ दिया हो।

देवू का दिमाग रुक गया। उसने कमरे में चारों तरफ देखा। तेज़ी से। फिर और तेज़।

“नहीं…” आवाज़ बाहर नहीं आई। सिर्फ़ होंठ हिले। फिर उसने देखा। कमरे के एक कोने में, पर्दे के पास, कुछ और पड़ा था। कबूतर नहीं। बस उसका बचा हुआ हिस्सा। देवू वहीं खड़ा रह गया। न चिल्लाया। न भागा। न गिरा। उसके अंदर कुछ बैठ गया।

जैसे किसी ने सीधे दिल के बीच में खाली जगह बना दी हो। उसी पल एक परछाईं हिली। खिड़की के पास एक बिल्ली थी। उसकी आंखें ठंडी थीं। पेट भरा हुआ। मूंछों पर हल्का-सा खून। वह देवू को देख रही थी। कोई पछतावा नहीं। कोई डर नहीं। बस देख रही थी।

फिर वह कूद गई। खिड़की से बाहर। इतनी आसानी से जैसे कुछ हुआ ही न हो। देवू कुछ नहीं कर पाया। उसके हाथ उठे नहीं। उसकी आवाज़ निकली नहीं। वह बस देखता रहा। कमरा फिर से खामोश हो गया। पर अब यह खामोशी साथ देने वाली नहीं थी। यह खालीपन था। देवू धीरे-धीरे ज़मीन पर बैठ गया। ठीक उसी जगह जहाँ वह बीस दिनों से बैठता आ रहा था।

उसने पंख उठाया। बहुत संभालकर। वह हल्का था। अब भी। देवू ने पहली बार रोने की कोशिश की। पर आंसू नहीं आए। आंसू तब आते हैं जब कुछ बचा हो। यहाँ कुछ नहीं बचा था।

शाम हो गई। मां ने आवाज़ दी। “देवू, बाहर आ।” देवू नहीं उठा।

रात आई। लाइट जली। फिर बंद हुई। देवू वहीं बैठा रहा। अगले दिन उसने दाना फिर से रखा। पानी फिर से रखा। फिर याद आया। कुछ आदतें इतनी जल्दी नहीं मरतीं। दिन बीतते गए। कमरा साफ कर दिया गया। पंख फेंक दिया गया। पर देवू नहीं बदला।

वह अब भी उसी कोने को देखता था। जहाँ कुछ था। और अब कुछ नहीं है। उसे यह समझ में आने लगा था— कि attachment हमसे कुछ वादा नहीं करती। वह आती है। हमें ज़रूरी बना देती है। फिर एक दिन हमें अकेला छोड़कर चली जाती है।

देवू बारह साल का था। और पहली बार उसे पता चला— कि दुनिया में हर वो चीज़ जिसे हम बचाते हैं, वह हमें बचाने के लिए नहीं होती। कुछ चीज़ें सिर्फ़ इसलिए आती हैं ताकि जाते वक़्त हमारे अंदर एक स्थायी ख़ामोशी छोड़ जाएँ।

देवू उठा। खिड़की बंद की। कमरा अंधेरा हो गया। और उसी अंधेरे में उसका बचपन थोड़ा-सा और खत्म हो गया।

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