अपनी मर्ज़ी से
By Lokesh Bhardwaj / February 18, 2026 / No Comments / Poetries
तुम मिले ज़रूर इत्तेफ़ाक़ से,
मगर बिछड़ना लिखा था—अपनी मर्ज़ी से।
हवा में घुली थी तुम्हारी ख़ुशबू,
दिल लुटा बैठा मैं—अपनी मर्ज़ी से।
उस वक़्त कहाँ इल्म था तक़दीर को,
वो भी सितम ढा जाएगी—अपनी मर्ज़ी से।
रूह में सँजोया तुम्हें, हर साँस में,
हर ख़्वाब को जी लिया—अपनी मर्ज़ी से।
तुमने फ़ासला चुना, ये तुम्हारा क़स्द था,
मैं हिज्र में जलता रहा—अपनी मर्ज़ी से।
पूछते हो मेरा क़सूर क्या था आख़िर?
मैं मोहब्बत में फ़ना हो गया—अपनी मर्ज़ी से।
तुमने इश्क़ को जंग समझ लिया,
मैंने हार को भी अपनाया—अपनी मर्ज़ी से।
अब दिल वीरान है, तन्हाई का मक़ाम,
हर अक्स में तुम बसे—अपनी मर्ज़ी से।
अव्यक्त लिखता है ये दर्द का क़़स्सा,
नाम तुम्हारा रुका है साँसों में—अपनी मर्ज़ी से।