जब से इक नज़र उन्हें बेहिसाब देखा है
नींद तो आई नहीं, बस ख़्वाब देखा है

रहता है जो उनकी ज़ब्त में अक्सर
उस नज़र को भी आज बेताब देखा है

इक नज़र उनकी और खुशगु़माँ हम ऐसे
जैसे इश्क़ का अहद-ए-शबाब देखा है

दिखती नहीं किसी शय में ज़रा भी तासीर
उस नज़र में जो शिद्दत-ए-आफ़ताब देखा है

होती होगी ज़माने की निगाह-ए-बेग़ैरत
हमने तो इश्क़ को बा-हिजाब देखा है

ज़िन्दगी सवालों की एक फेहरिस्त सी है
और उस इक नज़र में सारा जवाब देखा है

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