ख़्वाब
By Lokesh Bhardwaj / January 18, 2026 / No Comments / Poetries
ख्वाब तो कई है,
कुछ बिखरे,
कुछ टूटे,
कुछ नए,
कुछ पुराने,
पर वोह ख्वाब ही क्या,
जिसके साथ वफादारी ना की हो,
जिसके लिए नींद ना खोई हो,
जिसने बेचैन ना किया हो।
ऐसा ही एक ख्वाब देखा था मैंने,
कभी,
पर इन अंधेरो ने मुझमे ही मेरे उस ख्वाब को दफना दिया,
और वक़्त ने उस ख्वाब को गुमनामी में धकेल दिया।
फिर एक रोज तुझसे रूबरू हुए,
तब जाके याद आया,
यही ख्वाब तो देखा था मैंने।