जो दिल से उतरा, सो उतर ही गया,
रूह के शहर से हर असर ही गया।

कभी वो भी मेरी दुआओँ में था,
अब उस महफ़िल से मेरा ज़िक्र ही गया।

वो सितारा बने या बने माहताब,
मुझसे जो टूट गया, वो बशर ही गया।

मुझे मंज़ूर नहीं उसका फ़लक पे चमकना,
जब से मेरे सीने से उसका ख़याल ही गया।

फिर क्या पूछूँ मैं उसका दर्जा-ओ-मक़ाम,
जो रग-ए-जाँ से निकला, वो ग़ैर ही गया।

अब न शिकवा, न हसरत, न कोई सवाल,
दिल जो पत्थर हुआ, दर्द का डर ही गया।

अव्यक्त अब किस से करे वफ़ा की बात,
जब इश्क़ ही रूठा, तो इश्क का हुनर ही गया।

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