नाराज़गी भी मोहब्बत की एक अदा थी,
हर रूठने में तेरी क़ुर्बत की सदा थी।

लफ़्ज़ उलझे हुए थे तो आँखें ही बोल उठीं,
उस बेआवाज़ समझ में भी एक दुआ थी।

तेरी नाराज़गी में भी ठहराव का सब्र था,
हर शिकवे के पीछे लौट आने की रज़ा थी।

अब ये जो ख़ामोशी है, ये सिर्फ़ चुप रहना नहीं,
ये वो सज़ा है… जो बिना जुर्म के दी गई सज़ा थी।

कभी रूठ कर भी तू मेरा एहसास बचाती थी,
अब चुप रह कर तूने मेरी हस्ती मिटा दी है।

नाराज़गी में भी वफ़ा की एक ख़ुशबू थी,
ख़ामोशी में बस जुदाई की सर्द हवा थी।

मैं मानता हूँ, लड़ाइयाँ रिश्तों का हिस्सा थीं,
पर ये ख़ामोशी… मोहब्बत की आख़िरी इंतेहा थी।

तू रूठती थी तो लौट आने का यक़ीं होता था,
अब जो चुप है… वो वापसी से इनकार की सदा थी।

और आज Avyakta ये समझ चुका है,
नाराज़गी सह लूँगा… पर ये ख़ामोशी मौत से कम नहीं थी।

तेरी ख़ामोशी ने मुझसे सब कुछ छीन लिया,
सिर्फ़ साँसें छोड़ीं… वो भी उधार की थीं।

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