मत ढूँढ मेरा किरदार इस भीड़ के शोर में,
वफ़ादार अकेले मिलते हैं तन्हाई के दौर में।

चेहरों की रौनक़ों में अपनापन ढूँढता रहा,
सुकून मिला तो सिर्फ़ उजाड़े हुए एक कोर में।

जो रूह से जुड़े थे, वो भी बिछड़ते चले गए,
जैसे बादल थक के छोड़ दें आसमान भोर में।

अब ख़ामोशी ही मेरी रफ़ाक़त में ठहरी है,
यही तो साथ देती है हर टूटे हुए दौर में।

यहाँ जिस्म बहुत हैं, मगर रूहें नापैद हैं,
ज़ख़्म मैं ढोता रहा, वो हँसते रहे बाज़ार-चौर में।

हर लफ़्ज़ पे नक़ाब है, हर सच पे पहरा है,
सादगी गुनाह बनी इस मक्कार से शहर में।

सच बोलना यहाँ सबसे बड़ा जुर्म ठहरा,
झूठ को ताज मिला हर महफ़िल, हर शोर में।

अब ख़ुद से ही मुहब्बत का सिलसिला क़ायम है,
बेवफ़ाई का ज़हर पी लिया था रिश्तों के दौर में।

सीख लिया है ख़ुद को थामना अपनी ही बाँहों में,
अब कोई ज़रूरत नहीं किसी और के ज़ोर में।

अव्यक्त कहता है — जो ख़ुद को पा ले वीराने में,
वो फिर नहीं भटकता किसी और की महफ़िल-ग़ौर में।

मत ढूँढ मेरा किरदार इस भीड़ के शोर में,
वफ़ादार अकेले मिलते हैं तन्हाई के दौर में।

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