कुछ रिश्ते ज़हर की तरह रगों में उतरते हैं,
फिर भी उन्हें उम्र भर निभाना ज़रूरी होता है।

मैंने जिसे रूह का सुकून समझा था कभी,
वही तबाही की पहली दहलीज़ बनना ज़रूरी होता है।

हर मुलाक़ात एक ताज़ा ज़ख़्म दे जाती थी,
फिर भी उसी ज़ख़्म से गुज़रना ज़रूरी होता है।

जिनसे मोहब्बत थी, वही नासूर बन गए,
कभी-कभी ख़ुद को भी छोड़ना ज़रूरी होता है।

उसकी ख़ामोशी में भी फ़रमान छुपा था,
मगर हर सच को पढ़ लेना ज़रूरी होता है?

उसकी नफ़रत तक मुझे अज़ीज़ लगती रही,
शायद जुनून में यूँ जल जाना ज़रूरी होता है।

मोहब्बत की भीख में कुछ झूठ बोले मैंने,
कुछ सच को सीने में दफ़नाना ज़रूरी होता है।

मैंने उसे जाने दिया, पर जाने नहीं दिया,
दिल की दहलीज़ पे रुक जाना ज़रूरी होता है।

हर रोज़ इश्क़ की क़ब्र पे फूल रखे मैंने,
और ख़ुद का मातम भी मनाना ज़रूरी होता है।

आईने से आज सवाल किया मैंने—
“मेरी ख़ता क्या थी?”
आईना बोला, “इंसान थे तुम,
मोहब्बत करना ज़रूरी होता है।”

मैंने ख़ुद को माफ़ किया तन्हाई में,
क्योंकि ख़ुद से नफ़रत छोड़ना ज़रूरी होता है।

अब याद करता हूँ उसे, मगर बिखरता नहीं,
कुछ दर्दों को महफ़ूज़ रखना ज़रूरी होता है।

और जब आख़िर क़लम उठाई मैंने,
तो बस एक जुमला लिखा—
“तुम्हें भूलना नामुमकिन था,
इसलिए ग़ज़ल में ज़िंदा रखना ज़रूरी होता है।”

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