तुम आधा सच बड़े सलीक़े से कहती हो,
हर झूठ को सच की सूरत में ढाल देती हो।

मैंने जो पूछा था, वो तोह बस एक सवाल था,
और तुम हर सवाल को इल्ज़ाम बना देती हो।

लबों पे मुस्कान है, और आँखों में मासूमियत,
और ना जाने दिल का कौन सा कतरा जला देती हो?

रातों को बिस्तर की ये दूरी गवाह है मेरी,
तुम जिस्म को पास रख कर रूह छुपा देती हो।

लफ़्ज़ों में तुम्हारे इत्र है, बातों में कोई धुआँ-सा,
और हर बात में कुछ अनकहा ज़हर गिरा देती हो।

मैंने भरोसे की एक ज़मीन रखी थी अपने पाँवों तले,
और तुम हर दफ़ा उस ज़मीन को हिला देती हो।

वो दिन भी आया जो डर बन के पलता था, सीने में,
और तुम गैर की बाहों में हँस के दिखा देती हो।

मेरी निगाहों के सामने ही तो था वो मंज़र था,
“तुम ग़लत समझ लेते हो।” इतना कहके हर बात टाल देती हो।

जब सच ने दस्तक दी, तो तुम रो पड़ीं,
आख़िर क्यों तुम आँसुओं को आख़िरी हथियार बना देती हो।

“तुम्हें मुझ पर यक़ीन नहीं?” — बस इतना कह कर,
हर बार हर एक कसूर सिर्फ़ मुझ पर सजा देती हो।

अब सच और झूठ का फ़र्क़ नहीं बचा,
क्योंकि तुम सच को ही दाग़दार बना देती हो।

इसलिए मैंने कहा था— अब कोई सफ़ाई मत देना,
क्यूँकि तुम हर सफ़ाई को एक फ़रेब बना देती हो।

रिश्ते तुम्हारे लिए एक सौदा बन गए शायद,
क्यूंकि तुम मोहब्बत को भी तिजारत बना देती हो।

अब इस घर में दो लोग है, पर अजनबी से,
क्यूंकि तुम एक छत के नीचे भी दूरी बढ़ा देती हो।

ख़ामोशी अब मेरी इबादत बन गई है,
क्यूंकि तुम यादों को ज़हर-ए-ख़ामोश बना देती हो।

Avyakta अब वो शख़्स नहीं रहा,
जो हर झूठ को मजबूरी समझ लेता हो।

मगर अब मैं वो हूँ— जो तुम्हें समझता हो,

क्यूंकि तुम आधा सच बड़े सलीक़े से कहती हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *