मैं वो शख़्स था जो ख़ुद से भी छुपा रहता था,
ख़ामोशी के मलबे में अपना घर बना लिया।

रूहानियत के नाम पर ख़ुद को धोखा देता रहा,
हर सवाल से भागकर एक हुनर बना लिया।

तन्हाई का असर ऐसा हुआ कि दुश्मन भी अपने लगे,
जो ज़हर थे रगों में, उन्हीं को हमसफ़र बना लिया।

जिन निगाहों में सिर्फ़ नफ़रत का समुंदर था,
उन्हीं आँखों को हमने आख़िरी दर बना लिया।

बरसातों में भी सूखा रहा दिल का ये वीराना,
हर क़तरे की तड़प को अपना असर बना लिया।

शहर भी भीगता रहा, मैं भीगता रहा अंदर,
इस गीली उदासी को मैंने मुक़द्दर बना लिया।

जो चेहरे ख़्वाब में भी मुझे तोड़ते थे,
रातों में उनसे बातों का शहर बना लिया।

सिगरेट की राख में दफ़्न किए ख़त पुराने,
हर जले हुए लफ़्ज़ को ज़ेवर बना लिया।

मुहब्बत की तलाश में सब कुछ हार बैठे,
अब जलन से भी रिश्ता बराबर बना लिया।

जिस आग से भागता था कभी नफ़्स मेरा,
आज उसी आग को सजदा-ए-सर बना लिया।

आईने के सामने खड़ा था एक टूटा हुआ आदमी,
उस परछाईं को मैंने अपना हमसफ़र बना लिया।

अब ख़ुद से भी अजनबी हूँ, ऐ ‘अव्यक्त’,
इतनी तन्हाई ओढ़ी कि ख़ुद को क़हर बना लिया।

तन्हाई का असर आख़िर ये भी दिखा गया,
वीरान दिल की बस्ती में अपना मज़ार बना लिया।

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