वो बोली – अब बदल गए हैं मेरे मेयार-ए-मोहब्बत,
न रहे वो जज़्बात, न बची है कोई चाहत।

कहा – “देखो कितने हैं मुझपे फ़िदा, कतार लगी है यहाँ,
तुमसे बेहतर मिल गया है, अब क्यों करूं इंतज़ार वहाँ?”

गिनाई मेरी कमियाँ, किया मुझसे मुक़ाबला,
बोली – “वो है जो शहंशाह, तुम तो बस एक मुसाफ़िर-ए-रवाँ।”

मेरी हस्ती को किया ज़लील, मेरे ख़्वाबों को तार-तार,
जैसे कोई बेवफ़ा करे अपने वफ़ादार का तिरस्कार।

मैं ख़ामोश रहा, फिर आहिस्ता से बोला यूँ,
“ऐ महबूबा-ए-बेवफ़ा, सुन लो मेरा ये फ़साना भी तू…”

सबके दिलों में बसते हो तुम,
हाय बड़े सस्ते हो तुम!

जो हर किसी को मिल जाए बेशक़ीमत,
उसे कहते हैं रिवाज-ए-आम, न कोई हुस्न, न इज़्ज़त।

जिसे तुम समझी थी अपनी क़ीमत-ए-आला,
वो तो बाज़ार-ए-इश्क़ में है सिर्फ़ एक मोल-भाव वाला।

बाक़ी रहेगी मेरी रूह में वफ़ा की रवायत,
और तुम… बदलती रहोगी हर मौसम की तरह अपनी हक़ीक़त।

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