एक ही आरज़ू है अब,

की

तेरा हर एक आँसू मेरे कन्धे पर निकले,

तेरी हर खुशी में मैं शामिल होऊँ,

और मेरे चेहरे की हर हँसी का कारण तू बने।

मुझे रोज तू ऐसे ही परेशान किया करे,

और शाम तक मैं तुझे माफ कर दूंगा,

ताकि

मैं फिरसे तुझसे नाराज हो सकूँ।

तू मुझसे ऐसे ही लिपट जाए,

जैसे ही मेरे माथे पर शिकन आये,

और फिर तेरी हँसाने की कोशिशें,

मेरी मुश्कुराहट बन जाये।

ये सांसे तो गिनती की है,

ज़िन्दगी और इसका मुकद्दर भी खुदा के हाथ में है,

शायद इसलिए

मैंने दिल दिया है तुझे, ज़िन्दगी नही

अब खुदा बना लिया तुझे

तोह ये ज़िन्दगी भी हुई तेरी, ख़ुदा की नही।

दुनिया

मेरी इस आरज़ू को मोहब्बत कहती है,

और अगर यही मोहब्बत है,

तो

मैने भी जुनून भर दिया है इसमें।

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